क्या हिंसक बना सकता है प्रीमेंस्ट्रुअल स्ट्रेस सिंड्रोम?
शोधकर्ताओं ने पीएमएस के 150 लक्षणों की पहचान की है.
शोधकर्ताओं ने पीएमएस के 150 लक्षणों की पहचान की है.(फोटो: iStock)

क्या हिंसक बना सकता है प्रीमेंस्ट्रुअल स्ट्रेस सिंड्रोम?

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक बच्चे की हत्या की आरोपी एक महिला को इस आधार पर बरी कर दिया है कि अपराध करते समय, वह प्रीमेंस्ट्रुअल स्ट्रेस सिंड्रोम या पीएमएस से प्रेरित पागलपन से पीड़ित थी.

अदालत ने तीन डॉक्टरों की गवाही पर भरोसा किया जो इस बात पर सहमत थे कि महिला गंभीर पीएमएस से पीड़ित थी. एक डॉक्टर का यह भी कहना था कि उसके लक्षण इतने गंभीर थे कि उसे शांत करने के लिए बेहोशी का इंजेक्शन देना पड़ा.

जजों ने इस मुद्दे पर किताबों और शोधपत्रों का भी सहारा लिया. इस फैसले पर जजों ने लिखा:

भले ही भारत में ऐसे कानून नहीं हैं, जिसमें पीएमएस को पागलपन के लिए ढाल माना जा सकता है. फिर भी आरोपी को इस तरह का बचाव पेश करने और उसे साबित करने का अधिकार है कि वह ‘प्रीमेंस्ट्रुअल तनाव सिंड्रोम’ से पीड़ित है.

लेकिन क्या PMS के लक्षण इतने खतरनाक होते हैं?

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समस्या यह है कि PMS स्पष्ट रूप से परिभाषित सिंड्रोम नहीं है. शोधकर्ताओं ने इस श्रेणी में आने वाले 150 लक्षणों की पहचान की है.

जर्नल ऑफ विमेन हेल्थ में 2011 के एक अध्ययन में कहा गया है कि मासिक धर्म वाली महिलाओं में से 20 फीसद को पीएमएस है, जो उनके उनके जीवन को प्रभावित करता है, और उनको प्रोफेशनल की मदद हासिल करने की जरूरत है.

इसमें समस्या ये है कि भारत में इस पर डेटा की कमी है. हम, डॉक्टर के रूप में, पीएमएस की गंभीर स्थिति से निपटने के लिए प्रशिक्षित भी नहीं हैं, जिस पर ध्यान देने की जरूरत है. क्या हम इन मामलों को मनोचिकित्सकों के पास भेज रहे हैं? क्या पर्याप्त फालोअप है?
डॉ. निकिता सोप्ती, स्त्री रोग विशेषज्ञ, मैक्स अस्पताल, गुरुग्राम
पीएमएस का पता लगाना मुश्किल होता है और डॉक्टर अक्सर लक्षणों को अनदेखा करते हैं.
पीएमएस का पता लगाना मुश्किल होता है और डॉक्टर अक्सर लक्षणों को अनदेखा करते हैं.
(फोटो: iStockphoto) 

तो आप PMS की पहचान कैसे कर सकते हैं?

  • अगर अवसाद, अनिद्रा, और बेहद थकान जैसे लक्षण बार-बार होते हैं (कम से कम दो मासिक धर्म चक्रों के लिए).
  • यदि लक्षणों की शुरुआत डिंब उत्सर्जन (ओवुलेशन) के आसपास होती है और ये आपके जीवन को काफी बाधित करते हैं.
  • यदि ब्लीडिंग शुरू होने के पांच दिनों के भीतर ये लक्षण गायब हो जाते हैं, तो आपको पीएमएस हो सकता है.

पीएमएस का एक रूप है, जो अधिक गंभीर है. प्रीमेंस्ट्रुअल डिसफॉरिक डिजीज या पीएमडीडी को अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन के डायग्नोसिस एंड स्टेटिस्टिकल मैनुअल ऑन मेंटल डिसऑर्डर द्वारा मानसिक बीमारी के रूप में दर्ज किया गया है.

मेयो क्लिनिक के मुताबिक:

पीएमडीडी का कारण स्पष्ट नहीं है. यह देखते हुए कि पीएमएस और पीएमडीडी दोनों में अंतर्निहित अवसाद और चिंता समान हैं, ऐसे में यह संभव है कि मासिक धर्म की अवधि को शुरू करने वाले हार्मोनल परिवर्तन मूड डिसऑर्डर के लक्षणों को और बिगाड़ देते हों. पीएमडीडी के ट्रीटमेंट में लक्षणों को रोकने या कम करने पर ध्यान दिया जाता है और इसमें एंटीड्रिप्रेसेंट्स शामिल हो सकते हैं.

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अगर इसका पता नहीं चलता और लंबे समय तक इलाज नहीं किया जाता, अगर मस्तिष्क में फीलगुड हार्मोन रिलीज नहीं हो रहा है और कोई शख्स ऐसे ही एक के बाद एक मासिक चक्र के दौर से गुजरता है, तो क्या कोई अतिवादी कदम उठा सकता है? यह काफी हद तक मुमकिन है.
डॉ. निकिता सोप्ती 

FIT के साथ बातचीत में, दिल्ली स्थित मनोवैज्ञानिक डॉ. अरुणा ब्रूटा ने बताया कि उन्होंने पीएमएस के ऐसे मामलों को देखा है जिसमें महिलाएं घबराहट, उन्मादी बर्ताव जैसे रोना, चीखना, चीजें फेंकना, या यहां तक कि अपने बच्चों को पीटने जैसे लक्षण प्रदर्शित करती हैं.

ऐसे लोग जिनको सीमांत-अवसाद या सीमांत-उन्माद है, पीएमएस के दौरान उनके लक्षण और बिगड़ने की आशंका रहती है. हत्या भी एक मनोवैज्ञानिक व्यवहार है.
डॉ. अरुणा ब्रूटा 

PMS से उपजा पागलपन और आपराधिक मामले

पीएमएस, या अधिक ठीक ढंग से कहें तो पीएमडीडी, आपराधिक मुकदमे में बचाव के रूप में भारत में दुर्लभ है. लेकिन पीएमएस से शुरू हुए पागलपन को फ्रांस में मान्यता प्राप्त है, और यूके में भी, ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें कुछ बहुत ही हाई प्रोफाइल हैं, जहां पीएमएस के कारण अपराध से बरी किए जाने या अपराध कम किए जाने की मांग की गई है.

ऑस्ट्रेलियाई अपराध विज्ञानी डॉ. पैट्रीशिया ईस्टियल ने अपने लेख ‘पीएमएस इन कोर्टरूम’ में, विभिन्न उदाहरणों को संग्रहित किया है, जहां गंभीर पीएमएस को बचाव के रूप में इस्तेमाल किया गया था. राजस्थान हाई कोर्ट ने भी अपने फैसले में उनके अध्ययन की मदद ली है.

इस बचाव को लागू करने के लिए अमेरिका में की गई एक कोशिश को मुख्यत: नारीवादी संगठनों द्वारा प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था, जिनको डर था कि यह एक महिला की छवि को उसके हार्मोन की गुलाम के रूप में पेश करेगी.

यह डर सही है, लेकिन ऐसे ही चिकित्सीय दशा भी एक सच्चाई है, जो गंभीर पीएमएस की ओर ले जाती है. अपने पेपर में, डॉ. ईस्टियल इसे साबित करने की जिम्मेदारी के बारे में बात करती हैं और यह भी बताती हैं कि इस तरह के मामलों में किस तरह सबसे कठोर शर्तों को पूरा करने की जरूरत है.

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