क्या हमारी परवरिश बचपन से ही बच्चों को लैंगिक भेदभाव सिखा रही है?
<b>लड़कों और लड़कियों के बीच खड़ी की जा रही इन गुलाबी और नीली चारदीवारियों के बारे में सोचिए.</b>
लड़कों और लड़कियों के बीच खड़ी की जा रही इन गुलाबी और नीली चारदीवारियों के बारे में सोचिए.(फोटो: AmitaMalhotra/EqualiTee)

क्या हमारी परवरिश बचपन से ही बच्चों को लैंगिक भेदभाव सिखा रही है?

(6 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है. फिट हिन्दी बच्चों पर लिंग भेद-भाव के खराब प्रभावों पर लिखे इस लेख को फिर से प्रकाशित कर रहा है.)

मैं तीन साल की बच्ची की मां हूं और यह देख कर दंग हूं कि मीडिया और समाज के जरिए हमारे बच्चों पर किस तरह लैंगिक भेद करने वाली सूचनाएं थोपी जा रही हैं, और उनके लिए पहचान, अभिव्यक्ति और आकांक्षाओं के तंग दायरे तय किए जा रहे हैं.

काफी छोटी उम्र से ही हमारे बच्चों का सीमित और तंग नजरिये से सामना हो रहा है, जिसमें उन्हें बताया जा रहा है कि लड़का होने का क्या मतलब है और लड़की होने का क्या मतलब है.

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जरा सुपर हीरो कल्चर के बारे में विचार कीजिए, जिसमें लड़कों के लिए आक्रामकता और प्रभुत्व को आदर्श बताया जा रहा है जबकि भावुकता को खारिज किया जा रहा है. या राजकुमारी की कहानी के बारे में सोचिए, जिसमें बताया जा रहा है कि लड़कियों की ताकत उनके रूप और संवरने में है.

इन खड़ी की जा रही नीली और गुलाबी चारदीवारियों के बारे में सोचिए. तो इस दुनिया में कहां गड़बड़ी है?

जेंडर स्टीरियोटाइप हमारे बच्चों के रास्ते की अड़चन बनते हैं

(फोटो:iStock)

लड़कियों के लिए खूबसूरती और कामुकता की जो अपेक्षाएं पेश की जा रही हैं, खासकर मीडिया में, उससे चिंता, हीनभावना, स्वाभिमान को ठेस और शारीरिक छवि के मु्द्दे जन्म ले रहे हैं.

लड़कों को लगातार अपनी भावनाएं जाहिर न करने की हिदायत दी जाती है. उन्हें दिया जाने वाला ‘मजबूत बनो’ का मंत्र बड़े जोखिम लेने से जुड़ा होता है. जिसका उनकी सेहत पर भी बुरा असर पड़ता है. बेइंतेहा शराब पीने से लेकर ड्रग्स लेने, शारीरिक हिंसा से लेकर जोखिम भरी ड्राइविंग के द्वारा उन पर खुद को मर्द साबित करने का दबाव डाला जाता है.

जेंडर स्टीरियोटाइप का हमारी अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

लैंगिक भेदभाव के कारण लोगों के सामर्थ्य की बर्बादी होती है. कुछ रिपोर्ट के अनुमान बताते हैं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को इस वजह से हर साल करीब 12 खरब डॉलर का नुकसान होता है. ये भेदभाव हमारे बच्चों की करियर आकांक्षाओं को सीमित करता है जिसके कारण प्रतिभा और उत्पादकता की बर्बादी होती है.

भारत सहित 15 देशों में 10 से 15 साल के बच्चों (और देखभाल करने वाले) पर एक अध्ययन किया गया. इसके मुताबिक जेंडर स्टीरियोटाइप 10 साल की उम्र तक गहराई से समा जाते हैं.

इससे साफ है कि हमें बच्चों के शुरुआती उम्र में ही लड़का और लड़की में भेद करने वाले रवैये को छोड़ना होगा.

मेरे काम और बेटी के साथ मेरे अनुभव ने मुझे सिखाया है कि अगर हम बदलाव लाना चाहते हैं, तो हमें इस पर आम जीवन में बातचीत करनी होगी.

हम, और खासकर हमारे बच्चे, छवियों के माध्यम से दुनिया को समझते हैं. अगर खेल,एडवेंचर आउटडोर एक्टिविटीज या वीरता की सभी छवियां लड़कों से जुड़ी हैं और दयालुता, देखभाल, परवरिश और सुंदर त्वचा की की छवियां लड़कियों का पर्याय हैं, तो ऐसे में हम अपने बच्चों में स्टीरियोटाइप को ही मजबूत करते हैं.

अच्छी खबर यह है कि अगर हम इन पूर्वाग्रहों के बारे में अधिक जागरूक हैं, तो हमारे पास उनको चुनौती देने और उन पर जीत हासिल करने का एक बेहतर मौका है.

साथ ही, उपभोक्ता के रूप में, हम बहुत कम समझ पाते हैं कि हम अपने आसपास केअवचेतन संदेशों से कितनी गहराई से प्रभावित हो रहे हैं. ब्लॉड डिजाइन संस्था के हन्ना गार्सिया ने हाल ही में यूके के बारह प्रमुख हाई क्लास दुकानों के कपड़ों का सर्वेक्षण किया, जिससे कि यह पता लगाया जा सके कि बच्चों के कपड़ों पर कैसे जानवरों को दर्शाया जाता है. उन्होंने ये पाया:

लड़कों के कपड़ों पर बड़े, खतरनाक, जंगली और शक्तिशाली जानवर बने पाए गए, जो शिकारी और हिंसक होते हैं. लड़कियों के कपड़ों पर छोटे, नुकसान न पहुंचाने वाले, पालतू, प्यारे और आज्ञाकारी जानवर बने पाए गए. खासकर जानवरों के बच्चे, उनके साथ फूल और धनुष भी बने पाए गए, ताकि गलती से भी कोई ये न समझ ले कि वो कपड़े लड़कों के लिए हैं.

क्या इससे कोई फर्क पड़ता है? शोधकर्ताओं का कहना है, हां. इससे बच्चों की सोच प्रभावित होती है कि उनके जेंडर के लिए क्या उपयुक्त है. शोधकर्ताओं की अपील है कि माता-पिता और उत्पाद निर्माता जेंडर-लेबलिंग वाले खिलौनों से दूरी बनाएं. साथ ही लड़कों और लड़कियों के लिए रंगों का विभाजन भी खत्म किया जाए.

(फोटो:iStock)

ये लैंगिक रूढ़ीवादिता हमारे बच्चों के लिए अच्छी नहीं है. यह हमारे समाज के लिए भी बुरी है. और ज्यादातर माता-पिता जो इससे छुटकारा पाना चाहते हैं, कोई विकल्प नहीं होने पर, एक से दूसरा ब्रांड बदलते रहते हैं. जाहिर है कि यही स्टीरियोटाइप कारोबार को भी नुकसान पहुंचाएगा.

(अमिता मल्होत्रा फेसिलिटेटर और Candidly की सह-संस्थापक हैं. Candidly बच्चों और नवयुवकों के बीच जेंडर, सेक्सुअलटी व मीडिया के मुद्दों पर बात करने का एक मंच है. Candidly के EqualiTee द्वारा जेंडर-न्यूट्रल कपड़े तैयार किए जाते हैं, जो कलर-डिवाइड और स्टीरियोटाइप्स का खात्मा करते है.)

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