बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर के साथ कैसी होती है जिंदगी?

बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर के साथ कैसी होती है जिंदगी?

फिट माइंड

कैमरा- नितिन चोपड़ा ( कैमरा असिस्ट किया - सुमित बडोला)

वीडियो एडिटर- कुणाल मेहरा

“ये सबकुछ दिमाग में शुरू और खत्म होता है.

इंसान का दिमाग सचमुच एक अनंत दायरा है.

बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर क्या है?

बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर एक मानसिक बीमारी है. इसमें मूड, अपनी इमेज और बर्ताव में लगातार बदलाव की दिक्कतें रहती हैं. बीपीडी से पीड़ित लोगों को बेहद तेज गुस्सा आता है, डिप्रेशन और चिंता में रहते हैं.

पर्सनैलिटी डिसऑर्डर एक ऐसी विचित्र बीमारी है जो ना बीमारी है, ना नॉर्मल है. और उसमें जो सबसे विचित्र नमूना है, वो है बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर. इसके 80% से 90% केस औरतों के साथ होते हैं. बाकी पुरुषों के साथ होते हैं, इसके जेनेटिक कारण हैं, जो लिंग से तय होते हैं.
डॉ संजय चुग, साइकियाट्रिस्ट
भारत में लगभग 2 करोड़ लोग बीपीडी के शिकार हैं. इनमें 95% लोगों को कोई मेडिकल मदद नहीं मिल पाती है.

बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर की वजह क्या है?

शबरी कहती हैं, ‘मेरी बुआ और मेरे चाचू दोनों को पैरानॉयड स्किजनोफ्रेनिया था, मेरे पापा और मम्मी जब लड़ते थे, तो मैं छिप कर रोती थी.’

कुछ ना कुछ जीन्स की कमी होती है या जब बच्चा मां के पेट में होता है, उस वक्त क्या हार्मोनल उथल-पुथल हुई है, उसका प्रभाव पड़ता है. जिस घर में घरेलू हिंसा होती है, उन परिवारों के बच्चों में इस तरह की पर्सनैलिटी डिसऑर्डर होने की आशंका बढ़ जाती है.
डॉ संजय चुग, साइकियाट्रिस्ट

“हादसा ये नहीं कि आप जीते जी मर जाएं

हादसा ये है कि आप जीते जी मरे हुए जीएं”

वो हादसे जिसने शबरी के मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव डाला?

  • प्यार और ब्रेकअप
  • पिता का देहांत
  • दोस्ती और धोखा

बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर के लक्षण

बॉर्डर लाइन के 9 लक्षण होते हैं, उनमें से पांच इस बीमारी का पता लगाने के लिए होने चाहिए, मुझमें 9 के 9 थे.
शबरी प्रसाद
  • खालीपन - व्यक्ति के अंदर सूनापन होता है, उसको क्रॉनिक फीलिंग्स ऑफ एम्प्टीनेस कहते हैं.
  • अस्थिर संबंध - रिश्तों में अस्थिरता होती है. डॉ चुग बताते हैं, ‘बच्चों का एक खिलौना होता है जिसे हम यो-यो बोलते हैं, जिसे आप फेंको तो वापस आपकी तरफ आ जाता है, इस तरह के रिश्ते को हम यो-यो रिलेशनशिप कहते हैं. आप या तो बहुत जल्दी किसी के पास चले जाएंगे और अगर पास चले गए तो बहुत जल्दी दूर खिंच जाएंगे.’
  • डिसोसिएशन (अलगाव)- आप किसी इंसान को या तो भगवान बना देंगे या अगर उस इंसान ने आपके खिलाफ कुछ कर दिया तो उससे नफरत करने लगेंगे.
  • पैरा-सुसाइड- ये सुसाइड करने से अलग होता है, इसमें जो विचार आते हैं, उसे पैरासुसाइड कहते हैं. इसमें सुसाइड का डर देकर अपना काम करवाना शामिल है.
  • गुस्सा- छोटी सी बात पर बहुत गुस्सा करना.
  • इम्पल्सिविटी (आवेगशीलता)- एकदम से कोई ख्याल उठना, बहुत अधिक खर्च करना, ऐसे पैसे जो आपके पास है ही नहीं. उधार ले कर खर्च करना.
  • छोड़ दिए जाने का डर- ऐसा लगता है कि आपको सब लोग छोड़ देगें. उन्हें अपने से दूर किए जाने के डर से आप उन्हें बार-बार फोन करने, तंग करने लगते हैं.
  • पैरानोया- दिमाग में डर, शक होना.
  • सेल्फ इमेज- शबरी बताती हैं, ‘पहले मैं राजनीतिज्ञ बनना चाहती थी, फिर मैं लेखिक बनना चाहती थी, फिर मैं डॉक्टर बनना चाहती थी, लेखिक तो मैं बन गई लेकिन बाकी चीजों को मैंने अधूरा छोड़ा हुआ है.’
बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर, पर्सनैलिटी डिसऑर्डर है वो आपकी पर्सनैलिटी में घुल जाता है, आप कभी इससे बाहर नहीं निकल सकते हैं, लेकिन आप इसे कम कर सकते हैं.  

कैसे होता है इसका इलाज?

बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर को कम करने के लिए दवाओं की भूमिका होती है, उससे अधिक महत्वपूर्ण है, काउंसलिंग या थेरेपी. अलग-अलग तरह की थेरेपी कारगर होती है, कुछ लोगों का मानना है कि एक खास तरह की थेरेपी होती है, जिसे हम DBT कहते हैं वो महत्वपूर्ण है.
डॉ संजय चुग, साइकियाट्रिस्ट

डायलेक्टिकल बिहेवियर थेरेपी (DBT)

  • व्यक्तिगत चिकित्सा
  • समूह कौशल प्रशिक्षण
  • माइंडफुलनेस
  • सेशन के बीच जरूरत पड़ने पर फोन कोचिंग
  • स्वास्थ्य की देखभाल करने वालों के लिए उनकी हिम्मत बनाए रखने के लिए सलाह और रोगी की देखभाल कैसे करें इस पर चर्चा
10 साल होने वाले हैं, तब से मैं हर हफ्ते थेरेपी के लिए जाती हूं, दवाएं मिलती हैं मुझे. दो बार रिहैब में रही हूं.
शबरी प्रसाद, लेखिक और बॉर्डरलाइन पेशेंट
लोगों को अब मैं समझाती हूं कि इन सब पैटर्न से निकलो और कुछ करो अपनी जिंदगी के लिए.

आज से 10 साल पहले वाली शबरी शायद शूर्पणखा की तरह थी, आज वाली शबरी, शबरी की तरह है, जो शबरी रामायण में थी.

“हम सीखते हैं, हम रोते हैं

और अंत में हम जंग जीत जाते हैं”

शबरी प्रसाद बॉर्डरलाइन के साथ जिंदगी गुजार रही हैं, साथ ही वो एक लेखिका और मेंटल हेल्थ एक्टिविस्ट हैं. मेंटल हेल्थ के खिलाफ जंग लड़ते हुए, वो अब अपनी दूसरी किताब लिख रही हैं.

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