किसी टेस्ट से भविष्य में होने वाली बीमारियों का पता चल सकता है?
प्रीडिक्टिव जेनेटिक टेस्ट काफी लोकप्रिय हो रहे हैं.
प्रीडिक्टिव जेनेटिक टेस्ट काफी लोकप्रिय हो रहे हैं.(फोटो:iStock)

किसी टेस्ट से भविष्य में होने वाली बीमारियों का पता चल सकता है?

भविष्यवाणी करने वाले, टैरो कार्ड रीडर, ज्योतिषी- ये सब इसलिए फलते-फूलते हैं क्योंकि ऐसे लोगों की भरमार है, जो अपने भविष्य के बारे में जानने या “देखने” को ख्वाहिशमंद होते हैं, भले ही वो उस पर यकीन करते हों या नहीं. यह देखने के लिए कि शादी चलेगी या नहीं कुंडली मिलाई जाती है. दिन कैसा बीतेगा, ये जानने के लिए राशिफल देखा जाता है.

कोई अचंभे की बात नहीं कि कुछ जोड़े शादी से पहले कुछ ऐसे ही भविष्य बताने वाले परीक्षणों से गुजर रहे हैं. अंतर यह है कि ये मेडिकल टेस्ट हैं. विज्ञान कभी पीछे नहीं रहता. हम ‘जन्मपत्री’ से ‘जीनोमपत्री’ पर आ गए हैं.

प्रीडिक्टिव जेनेटिक टेस्ट जो आपको भविष्य में होने वाली बीमारियों के जोखिम के बारे में जानकारी देते हैं, इन दिनों काफी लोकप्रिय हो रहे हैं और ये टेस्ट कराने वालों में सिर्फ जल्द शादी करने जा रहे लोग ही शामिल नहीं हैं.

लेकिन ये टेस्ट कितने सही हैं? क्या आप सतर्क हैं या जरूरत से ज्यादा उतावले हैं? और अगर नतीजे नकारात्मक आ गए तो आप किस तरह हालात का सामना करेंगे?

1. जेनेटिक टेस्टिंग क्या है?

यह इस सिद्धांत पर आधारित है कि क्रोमोजोम्स के 23 जोड़े जो कि आपको माता-पिता से विरासत में मिलते हैं, वह उससे कहीं ज्यादा आपके जीवन को प्रभावित करते हैं, जितना आप समझते हैं- ये क्रोमोजोम्स तय करते हैं कि आपकी सेहत कैसी होगी और भविष्य में आपका शरीर कैसा दिखेगा.

जींस में बदलाव या म्यूटेशन का पता लगाने के लिए किसी शख्स के डीएनए के अध्ययन को जेनेटिक टेस्टिंग कहते हैं. टेस्ट व्यक्तिगत रूप में हमारी संरचना को डिकोड करने और समझने में मदद करता है.

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जेनेटिक टेस्ट संदिग्ध जेनेटिक दशा की पुष्टि या खंडन कर सकते हैं या फिर पता लगा सकते हैं कि व्यक्ति में जेनेटिक डिसऑर्डर पैदा होने या हस्तांतरित होने की कितनी आशंका है.

अमेरिकी अभिनेत्री एंजेलिना जोली, एक टेस्ट में ये पता लगने के बाद कि उनमें BRCA1 जीन है, साल 2013 में प्रिवेंटिव सर्जरी द्वारा ब्रेस्ट, यूटरस (गर्भाशय) और फेलोपियन (डिंबवाही) ट्यूब निकलवाने के बाद काफी सुर्खियों में थीं. जीन से संकेत मिले थे कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर होने का जोखिम 87 फीसद और ओवेरियन (डिंब ग्रंथि) कैंसर होने का जोखिम 50 फीसद था.

2. क्या जेनेटिक टेस्ट भारत में उपलब्ध हैं? ये क्या कर सकते हैं?

आज जेनेटिक टेस्टिंग पूरी तरह एक नए स्तर पर जा चुकी है, जहां डीएनए टेस्ट से आपको कैंसर और दिल की बीमारियों के जोखिम से लेकर डाइट और वेट मैनेजमेंट प्लान क्या होना चाहिए, ऐसी हर चीज के बारे में बताया जा सकता है. ये यह भी बता सकते हैं कि कौन सा खराब जीन आपकी संतानों में जा सकता है.

जेनेटिक टेस्ट दो तरह के होते हैं: पहला मेडिकल डाइग्नोसिस के लिए और दूसरा निजी जानकारी के लिए कंज्यूमर टेस्ट.
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भारत में स्ट्रेंड लाइफ साइंस और मेडजीनोम जैसे कुछ सेंटर प्रेसक्रिप्शन की मांग करते हैं, जबकि पॉजिटिव बायोसाइंस एंड मैपमाईजीनोम जैसे सेंटर से सीधे संपर्क किया जा सकता है.

जीन टेस्टिंग अस्पतालों द्वारा नहीं की जाती है, बल्कि प्राइवेट मान्यता प्राप्त लैब्स द्वारा की जाती है. अस्पतालों का इन लैब्स के साथ करार होता है और आमतौर पर टेस्टिंग के लिए डॉक्टर रेफर करते हैं.

कंज्यूमर टेस्ट के लिए ऑनलाइन विकल्प भी हैं. एक सैंपल कलेक्शन किट मंगाइए, इसमें अपना सलाइवा (लार) डालिए और इसे लैब को भेज दीजिए. आपको पर्सनाइज्ड रिपोर्ट मिल जाएगी, जो बताएगी कि भविष्य की आंखों में आपके लिए क्या छिपा है और आप इस बारे में क्या कर सकते हैं.

स्ट्रेंड लाइफ साइंसेज के सीईओ और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) के एडजंक्ट प्रोफेसर डॉ रमेश हरिहरण बताते हैं कि ये कंज्यूमर टेस्ट हालांकि विदेशों में काफी लोकप्रिय हैं, लेकिन भारत में जेनेटिक टेस्टिंग अभी भी मुख्यतः डाइग्नोसिस के लिए ही इस्तेमाल की जाती है.

3. टेस्ट के रिजल्ट क्या संकेत दे सकते हैं?

रीप्रोडक्टिव हेल्थ, ऑन्कोलॉजी, कार्डियोलॉजी, ऑप्थेल्मोलॉजी, डर्मिटोलॉजिकल कंडीशन, ब्लड रिलेटेड बीमारियों जैसे तमाम क्षेत्रों में जेनेटिक टेस्ट मौजूद हैं.

कुछ बीमारियां पूरी तरह जेनेटिक कारणों से होती हैं. इनमें 4026 जीन के कारण होने वाली 6,340 बीमारियां शामिल हैं. इनमें से कई बीमारियां बचपन में होती हैं, लेकिन कई बीमारियां दशकों के बाद उभरती हैं.
डॉ रमेश हरिहरन, सीईओ, स्ट्रेंड लाइफ साइंस 

मेडजीनोम के सीओओ डॉ वीएल राम प्रसाद उन टेस्टों का नाम गिनाते हैं, जो आजकल ज्यादातर भारतीय करा रहे हैं.

  • युवा शादी से पहले कैरियर स्क्रीनिंग करा रहे हैं.
  • माता-पिता किसी सिंड्रोम और अपनी भविष्य में होने वाली संतान की अच्छी सेहत के बारे में पता लगाते हैं.
  • माता-पिता नवजात बच्चे की स्क्रीनिंग करा रहे हैं.
  • आईवीएफ कराने की स्थिति में दंपती प्लांटेशन से पहले हेल्दी एंब्रियो की स्क्रीनिंग करा रहे हैं.
  • परिवार में कैंसर की हिस्ट्री होने पर आनुवांशिक कैंसर टेस्ट करा रहे हैं, ताकि पता लगाया जा सके कि क्या जीन में कोई म्यूटेशन है.
  • कैंसर के मरीज विस्तृत कैंसर टेस्ट के लिए या अपने कैंसर को समझने और डॉक्टर के टारगेटेड थेरेपी तय करने के लिए लिक्विड बायोप्सी करा सकते हैं.
  • रेयर बीमारियों में बीमारी को समझने के लिए क्लीनिकल इक्जोम का सहारा ले सकते हैं.
  • डॉक्टर मरीजों की बीमारी की जड़ को समझने के वास्ते जेनेटिक टेस्टिंग के लिए रेफर करते हैं.

मैपमाईजीनोम की तरफ से दिए जा रहे कंज्यूमर टेस्ट में और भी नए आयाम हैं. ये आपको दुनिया भर की बीमारियों में सुझाव देते हैं- कैंसर, हार्ट डिजीज, हाइपरटेंशन, स्ट्रोक, डायबिटीज, स्किन हेयर प्रॉब्लम, डाइट पैटर्न, पार्किंसंस, पेट की समस्या, आंख की समस्या, शराबनोशी और यहां तक कि मेंटल डिसऑर्डर भी.

वैसे, ऊपर बताए गए दोनों किस्म के टेस्ट को अलग-अलग देखा और समझा जाना चाहिए. हालांकि सभी को जेनेटिक टेस्ट के व्यापक दायरे में शामिल किया जा सकता है, लेकिन इनकी सटीकता और नतीजों का मकसद एक जैसा नहीं है.

4. ये टेस्ट कितने सटीक और उपयोगी हैं?

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जेनेटिक टेस्टिंग के रिजल्ट को देखते हुए एक बात जो हमें याद रखनी चाहिए वो ये है कि बीमारी जीन का अकेला परिणाम नहीं है. हमारे जीवनकाल में कई कारक होते हैं, जो हमारी सेहत को प्रभावित करते हैं.

डॉ रमेश हरिहरण कहते हैं, “भविष्य के जोखिम की कुछ भविष्यवाणियां निश्चित हैं, खासकर सेहतमंद इंसान में जीन म्यूटेशन के चलते ब्रेस्ट, ओवेरियन और कुछेक अन्य कैंसर के मामले में; यह दुनिया भर में मानी जाने वाली गाइडलाइंस का हिस्सा है और हाई रिस्क की स्थिति पाए जाने पर इसके तहत रिस्क मैनेजमेंट के लिए जरूरी कदम उठाए जाते हैं. अन्य ज्यादातर अंदाजा हैं, व्यक्तिगत रूप से लागू होने की बजाए सामान्य रूप से बड़ी आबादी पर लागू होते हैं.”

कई कारणों से सटीकता सीमित है. पहला, जेनेटिक बीमारी के बारे में ये टेस्ट बीमारी को पैदा करने वाले बहुत थोड़े से म्यूटेशंस का पता लगाते हैं. ऐसे में यह तीर-तुक्का है. दूसरी बात उम्र से जुड़ी आम बीमारियों जैसे कि कोरोनरी डिजीज और डायबिटीज जो कि गहराई से जेनेटिक कारणों से जुड़ी नहीं हैं, इनकी उत्पत्ति को आनुवांशिकता से जोड़ना मुश्किल है. फिलहाल इन बीमारियों के लिए जेनेटिक टेस्टिंग को आमतौर पर डॉक्टरी नजरिए से फायदेमंद नहीं समझा जाता.
डॉ रमेश हरिहरण

डॉ रामप्रसाद कहते हैं कि फिर भी, डायग्नोस्टिक इस्तेमाल के लिए जेनेटिक टेस्टिंग एक सटीक तरीका है. “40 से 50 फीसद लोग ऐसी रिपोर्ट पाते हैं, जो बताती है कि क्या कदम उठाया जाना चाहिए. रिपोर्ट के नतीजों से इलाज का रुख तय होता है.”

जेनेटिक टेस्टिंग प्रिवेंशन, ट्रीटमेंट और कैंसर जैसी बीमारियों, रीप्रोडक्टिव हेल्थ जैसे मामलों का अटूट हिस्सा बन चुकी है. फिलहाल अभी जबकि निजी तौर पर रिक्रिएशनल जेनेटिक्स की सुविधा चंद एक लैब द्वारा ही दी जा रही है, भारत में गंभीर जीनोमिक्स आधारित बड़ा बाजार अभी सपना ही है.
डॉ वीएल राम प्रसाद, सीओओ, मेडजीनोम

5. क्या इसका कोई नुकसान है?

इस तरह की टेस्टिंग में दो मूलभूत मुद्दे हैं: पहला, कोई ‘रिजल्ट’ किसी स्थिति के पैदा होने की सिर्फ संभावना जता सकता है; और दूसरा, स्थिति ना तो रोकने लायक और ना ही ठीक करने लायक हो सकती है.

इसने इस अभ्यास की नैतिकता को लेकर एक बहस को जन्म दिया है. बहुत से डॉक्टर मानते हैं कि जेनेटिक टेस्ट से मिलने वाला हर विवरण किसी शख्स के जोखिमों के बारे में “काम की जानकारी” नहीं देता.

उदाहरण के लिए, एंजेलिना जोली जैसा कोई शख्स, जिसके साथ कैंसर की हिस्ट्री है, उसके मामले में इस टेस्ट की सलाह दी जा सकती है. लेकिन अगर किसी की जेनेटिक से जुड़ी बीमारी की फैमिली हिस्ट्री नहीं है, तो ऐसे मामले में डॉक्टरों की राय बंटी हुई है, क्योंकि ऐसा करना जांच पर आधारित नहीं होगा, बल्कि सिर्फ अटकलबाजी होगी.

किसी शख्स में किसी बीमारी की पुष्टि होने या ऐसी बीमारी का पता लगने जिसका पूरी तरह इलाज नहीं किया जा सकता या मामूली रूप से ठीक हो सकता है, तो उसे एंग्जाइटी और तनाव हो सकता है.

बहुत से लोग नतीजों के बाद पैदा हुए हालात का सामना करने के लिए भावनात्मक रूप से तैयार नहीं हो सकते हैं. ऐसे में इन टेस्ट को लेकर काउंसलिंग भी जरूरी हो जाती है.

6. क्या इस तेजी से बढ़ते उद्योग का कोई नियम-कायदा है?

scroll.in की एक रिपोर्ट में आईसीएमआर की प्रमुख डॉ सौम्या स्वामीनाथन को उद्धृत करते हुए कहा गया है कि पर्सनल जेनेटिक्स को लेकर भारत में कोई कायदा-कानून नहीं है और इनके टेस्ट बेचने वाली कंपनियां लोगों का शोषण कर रही हैं.

भारत में मेडिकल शोध को विनियमित करने वाली संस्था इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने जेनेटिक टेस्टिंग लैबोरेटरीज को लेकर कोई गाइडलाइंस नहीं बनाई है.

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