बिहार में चमकी बुखार की वजह तलाशने में मददगार होगी वर्बल ऑटोप्सी?
बिहार के मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से अब तक 100 से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है.
बिहार के मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से अब तक 100 से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है.(फोटो: PTI)

बिहार में चमकी बुखार की वजह तलाशने में मददगार होगी वर्बल ऑटोप्सी?

बिहार के उत्तरी हिस्से के मुजफ्फरपुर सहित कई जिलों में फैले एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (AES) के कारणों का पता लगाने के लिए विशेषज्ञों की टीम मुजफ्फरपुर पहुंचकर जांच कर रही है. ये टीम वर्बल ऑटोप्सी के जरिए एईएस के कारणों की जांच करेगी.

क्या है वर्बल ऑटोप्सी?

एक्सपर्ट्स की टीम यहां के अस्पतालों में चमकी बुखार या एईस से पीड़ित भर्ती बच्चों के रजिस्ट्रेशन, बीमारी के लक्षण, इलाज के तरीके और हॉस्पिटल से छुट्टी के डेटा इकट्ठा कर पूरी जानकारी ले रही है.

इनमें वे पीड़ित बच्चे भी शामिल होंगे, जिनकी इस बीमारी से मौत हो गई है. इस टीम का नेतृत्व कर रहे राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के सलाहकार डॉ अरुण कुमार सिन्हा इस पूरी प्रक्रिया को 'वर्बल ऑटोप्सी' कहते हैं.

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क्या कहती है शुरुआती जांच?

उन्होंने कहा, "मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेमोरियल कॉलेज अस्पताल (SKMCH) और केजरीवाल मातृसदन से कम से कम 100 पीड़ित बच्चों की बीमारी का अध्ययन किया गया है. पूरी जांच वर्बल ऑटोप्सी के जरिए की जा रही है."

शुरुआती टेस्ट में बच्चों का मेटाबॉलिज्म सही ढंग से काम नहीं करने की बात सामने आई है. इससे शरीर में सेल (कोशिका) का माइटोकांड्रिया (कोशिका का ऊर्जा गृह) सही ढंग से काम नहीं कर रहा है. इसी कड़ी में लिवर भी सही ढंग से काम करना बंद कर दे रहा है, जिससे शरीर में बनने वाला अमोनिया डिटॉक्सिफाई नहीं हो पा रहा है.
डॉ अरुण कुमार सिन्हा

विशेषज्ञों का मानना है कि यही अमोनिया ब्रेन तक पहुंचकर बच्चों को हैप्टिक इंसेफेलोपैथी का शिकार बना रहा है.

अनुवांशिक कारणों से भी AES होने की आशंका

माइटोकांड्रिया किसी भी कोशिका के अंदर पाया जाता है, जिसका मुख्य काम कोशिका के हर हिस्से में ऊर्जा पहुंचाना होता है. इसी कारण माइटोकांड्रिया को कोशिका का पॉवर हाउस भी कहा जाता है.

पीड़ित बच्चे अगर बीमारी के तुरंत बाद अस्पताल पहुंचते हैं, तो उनकी जान बचाई जा सकती है.
पीड़ित बच्चे अगर बीमारी के तुरंत बाद अस्पताल पहुंचते हैं, तो उनकी जान बचाई जा सकती है.
(फोटो: PTI)
टीम में शामिल एक डॉक्टर ने बताया कि कुछ विशेषज्ञों को आशंका है कि बच्चों में कुछ अनुवांशिकी कारणों से भी ये बीमारी हो रही है. उन्होंने बताया कि माइटोकांड्रिया को देखकर जब इलाज की दिशा बदली गई, तो कई पीड़ित बच्चों की जान बच गई.

SKMCH के अधीक्षक डॉ एस के शाही ने बताया कि माइटोकांड्रिया की बात सामने आने के बाद बच्चों का डीएनए टेस्ट भी संभव है. इसके लिए पहल हो चुकी है.

पहली बार इलाज के दौरान बच्चों के सभी ऑर्गन की पैथोलॉजिकल जांच कराई गई है, यही कारण है कि माइटोकांड्रिया जैसी समस्या सामने आई. इस बार सेंटर फॉर डीएनए फिंगर प्रिंटिंग एवं निदान संस्थान (सीडीएफएन) हैदराबाद को मसल्स के सैंपल भेजे हैं. कई बच्चों के सैंपल की दिल्ली में बायोप्सी कराई गई है.
डॉ एस के शाही, अधीक्षक, SKMCH

डॉक्टरों का कहना है कि पीड़ित बच्चे अगर बीमारी के तुरंत बाद अस्पताल पहुंचते हैं, तो उनकी जान बचाई जा सकती है.

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अब तक 165 से ज्यादा बच्चों की मौत

15 साल तक की उम्र के बच्चे इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं
15 साल तक की उम्र के बच्चे इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं
(फोटो: PTI)

गौरतलब है कि 15 साल तक की उम्र के बच्चे इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं और मरने वाले बच्चों में से ज्यादातर की उम्र एक से सात साल के बीच है.

इस साल अब तक 165 से ज्यादा बच्चों की मौत एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम से हो चुकी है और करीब 750 बच्चे इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे हैं, जिसमें कई बच्चे स्वस्थ होकर भी वापस लौटे हैं.

मुजफ्फरपुर में एईएस का पहला मामला 1995 में सामने आया था. इस बीमारी को लेकर अब तक कोई निश्चित कारण सामने नहीं आए हैं, लेकिन उच्च तापमान और वातावरण में नमी बढ़ने से इस बीमारी का कहर ज्यादा दिखाई देता है.

इससे पहले दिल्ली के नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के विशेषज्ञों की टीम और पुणे के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) की टीम भी यहां इस बीमारी का अध्ययन कर चुकी है.

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